5/6/18

भारत की पहली अत्याधुनिक प्रयोगशाला आनंद (मिल्क सिटी) में स्थापित की जाएगी, जो पूरी तरह से शहद की शुद्धता सुनिश्चित करेगी।


विभिन्न तरह के शहद
भारत की पहली अत्याधुनिक प्रयोगशाला आनंद (मिल्क सिटी) में स्थापित की जाएगी, जो पूरी तरह से शहद की शुद्धता सुनिश्चित करेगी।
राष्ट्रीय डेरी विकास बोर्ड और नेशनल बी बोर्ड के साथ मिलकर इस प्रयोगशाला के लिए काम करेंगे और साथ ही मधुमक्खि पालन का व्यवसाय वैज्ञानिक रूपसे हो ऐसा कार्य करेंगी।
वास्तव में, यह प्रयोगशाला पशुधन और खाद्य विश्लेषण केंद्र का एक प्रभाग है, जिसमें केवल शहद का परीक्षण किया जाएगा।
आपको यह जानकर आश्चर्य हो सकता है कि भारत में किसी भी प्रयोगशाला के प्रमाणपत्र को शहद के निर्यात के लिए उपयुक्त नहीं माना जाता है। शहद को निर्यात करने के लिए, व्यापारि अधिक पैसा खर्च करके इंटरटेक प्रयोगशाला, जर्मनी या संयुक्त राज्य अमेरिका में शहद की टेस्टिंग करवाते  है।
इंटरटेक प्रयोगशाला के  प्रमाणपत्र में वैज्ञानिक रूप से शहद प्रमाणित करने के कई पहलू हैं। इस तरह की विश्वसनीयता भारत की प्रयोगशाला से उपलब्ध हो, इस आशय के साथ इस प्रयोगशाला को बनाया गया है। शहद का सही स्थान (कहां से) और कोनसे फूलमें से बना है, उसकी जांच सटीक तरीके से हो सकती है। शहद की शुद्धता सुनिश्चित करने के लिए, यह जानना आवश्यक है कि यह चीनी सिरप या किसी अन्य प्रकार को मिश्रण तो नहीं बना है, और यह मधुमक्खी को चीनी सिरप फीड करवाके बनाया हुआ तो नहीं है।

इसके अलावा, मोम, पराग, रॉयल जेली, प्रोपोलिस और मधुमक्खियों के जहर जैसे अन्य उत्पादों का भी परीक्षण किया जा सकता है। मधुक्रान्ति प्रक्रिया के एक हिस्से के रूप में मधुमक्खी पालन के व्यवसाय को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रीय बी बोर्ड और राष्ट्रीय डेरी विकास बोर्ड अन्य कार्यभी करेंगे।

संदर्भ: टाइम्स ऑफ इंडिया / वडोदरा समाचार 4 जून 2018

13/3/18

मधुमक्खी पालन व्यवसाय- "जानिए सिक्के का दूसरा पहेलु।"


मधुमक्खी पालन
  • गुजरातमें बहुत सारे लोग शहद के व्यवसाय से ज्यादा मधुमक्खी के व्यवसाय में अधिक दिलचस्पी ले रहे है
  • में २०१२ से मधुमक्खी पालनका कार्य कर रहा हु, इतने सालो मेंने बहुत कुछ देखा है। जो मधुमक्खी पालन के काम में जुड़ने वाले हर नए व्यक्ति के लिए जानना जरुरी है।
  • वर्तमान समय में हमारे देश में लाखो नव युवान और किशानो की आशाभरी नज़र मधुमक्खी पालन के व्यवसाय की तरफ है। जिसमे माननीय प्रधानमंत्री मोदीजी के “स्वीट रिवोल्यूशन” बड़ा योगदान है। मधुमक्खी पालन वर्त्तमान समय की जरूरत है क्युकी इसमें लोगो की स्वास्थ्य सम्बन्धी, रोजगार सम्बन्धी और खेतो में परागण सम्बन्धी काफी समस्याओ का समाधान छुपा हुआ है।  
  • परन्तु जैसे हर सिक्का दो तरफ़ा होता है उसी तरह यहा भी नकारात्मक पहलू विकसित हो रहा है
  • गुजरातमें बहुत सारे लोग शहद के व्यवसाय से ज्यादा मधुमक्खी के व्यवसाय में अधिक दिलचस्पी ले रहे है जिनका भोग उत्साही नव युवान और भोले किशान बन रहे है  बहुत से लोग प्रलोभनित और तर्कहीन बाते बोल कर केवल मधुमक्खी बेचने का काम कर रहे है, जिन्होंने कभी व्यावसायिक रूप से मधु का उत्पादन भी नहीं किया हैं या सिर्फ मधुमक्खी की दलाली का कम करते है
  • लोग मधुमक्खी पालन और पशुपालन समान नजर से देख रहे हैं लेकिन वास्तविकता बहुत ही अलग है। व्यावसायिक रूप शहद का उत्पादन एक ही जगह पर स्थिर रह के करना संभव नहीं है। क्युकी एकही जगह में ३६५ दिन भारी मात्रा में फुल मिलाना लगभग नामुनकिन है।
  • मानलीजिये हमारे पास १०० मधुमक्खी की कोलोनी/ बक्से है, तो इनके लिए १०० एकर जमीन पर फुल होने चाहिए। अगर यह संभव हो तभी हमें कुछ फायदे रूप आय मिलेगी। इसी कारण एक मधुमक्खीपालक हर सीज़न के अनुसार अपने मधुमक्खी के बक्सों की जगह बदलता रहता है।
  • गुजरातमें लाई, अजवाईन, सोफ़ (वरयाली), धनिया, अरहर, तिल, अल्फाल्फा, बबुल और नारयल जैसे पाक मधुमक्खी के लिए उपयोगी है
  • गेहू, कपास, मूंगफली, ज्वार, धान, आदि जैसे पाक मधुमक्खी के लिए उपयोगी नहीं है, इस बात को अवश्य ध्यान रखे।
  • गुजरात और उत्तर भारत की भौगोलिक स्थिति बहुत भिन्न हैगुजरात में शहद के उत्पादन में बहुत कम होता है, जिसके कारण ज्यादा तापमान,  हरे रंगकी चिडया की ज्यादा मात्रा एवं खेतो में ज्यादा जंतुनाशक का प्रयोग है
  • मधु के आर्थिक मूल्य को लेकर लोगों के दिमाग में कई भ्रम हैं। अगर कोई व्यक्ति अपना शहद खुद पेक करके बेचता है, तो वह गुणवत्ता और मार्केटिग अनुसार उसका मूल्य अर्जित कर पायेगा। परन्तु यदि वह अपना शहद थोक व्यापारी को या कंपनी को बेचता  है, तो उसे इसे एक मामूली कीमत ही मिलेगी
  • इसीलिए में यह सलाह देता हु की, कोईभी व्यक्ति मार्केट खुद मुआइना करके मधुमक्खी पालन के कार्य में प्रवेश करे।
  • मधुमक्खियों की बिक्री करने वाले लोग, अधिकतर अतिरंजितबाते करते है, कोईभी प्रोजेक्ट रिपोर्ट बनाने और लॉन लेने से पूर्व इस कारोबार सही तरीके से जानना आवश्यक है
  • में यह सलाह करता हु की कम निवेश के साथ छोटे पैमाने पर मधुमक्खी पालन की शरुआत करे और धीरे धीरे अनुभव के साथ ज्यदा निवेश करके आगे बढे
  • अनार, आम जैसे बागायती पाको में परागण के लिए मधुमक्खी के बक्से रखने से पहले उपयोग किये जानेवाली जंतुनाशक का अभ्यास अवश्य करे। क्युकी मधुमक्खी बहुत शोम्य कीटक (डंख होने के बावजूद ... !!) है, वह जंतुनाशक के  सामने टिक नहीं पाती। मधुमक्खी पालन में विफल बागवानी किसानों की सूची बहुत बड़ी है।
  • मेरी व्यक्तिगत राय यह है कि यदि आपको मधुमक्खीके प्रति लगाव है, तभी इस क्षेत्र में आगे बढे, क्योंकि केवल आर्थिक पहलू पर विचार करने वालो को, मधुमक्खिया जल्दी काट लेती है।
  • इस अर्टिकल को गुजराती में पढने के लिए यहा पर किल्क करे https://indigenousrawhoney.blogspot.in/2018/03/blog-post_12.html

3/3/18

मधुमक्खी के प्रकार



आवास के अनुसार मधुमक्खी के प्रकार कुछ इस तरह है। विभिन्न निवास स्थान पर छते  बनाने का यह तरीका उन्हें आक्रामक या शांतिपूर्ण बना है। हम भारत में पाए जाने वाले मधुमक्खियों के प्रकार पर चर्चा करते हैं।

१. एपीस डोरसाटा लाइबोरियोसा (हिमालयन मधुमक्खी):
यह मधुमक्खी दुनिया की सबसे बड़ी मधुमक्खी है। कामदार मधुमक्खी की लंबाई ३.० सेमी से ३.५ सेमी (१ से १.५ इंच) है। सामान्य रूप से एक मधुमक्खी के छते ६० किग्रा या उससे अधिक शहद होता है। वे ज्यादातर हिमालय में २५०० मीटर से ३००० मीटर की ऊंचाई पर पाए जाते हैं।
वे विशेष रूप से लाल शहद के लिए जाने जाते हैं जिनमें मादक प्रभाव होता है। हिमालय के पर्वत श्रृंखला में यह मधुमक्खी कुदरती रूप से परागण के लिए काम करती है। अधिकतर यह शहद जापानकोरिया और हांगकांग में निर्यात किया जाता है।

हिमालयन मधुमक्खी

यह मधुमक्खी स्वभावमें अति आक्रमक है। इसलिए उनका मधुमक्खी पालन करना संभव नहीं है।

२.एपीस डोरसाटा (जंगली मधुमक्खी): 
इस मधु को स्थानीय रूप से "भ्रामर" मधुमक्खी या जंगली मधुमक्खी कहा जाता है। यह मधु एक एपिस डोरसाटा लाबीरियोसा (हिमालयी मधुमक्खी) की एक उपप्रजाति है। जैसा कि नाम से पता चलता है कि यह मधुमक्खी अपने आक्रामक स्वाभाव के लिए जानी जाती है। वे आमतौर पर पेड़ की शाखा में छते साथ जंगल में पाए जाते हैं। वे जंगल के प्राकृतिक परागणक का काम करती हैं। मधु को इकट्ठा करने की उनकी क्षमता इटालियन मधु की तुलना में अधिक है। 
जंगली मधुमक्खी
डंकने की उनकी जंगली प्रकृति के कारण, हम उन्हें पालतू बनाने में असमर्थ हैं। फिर भी,कुछ लोग शहदकी लालसामें इन के छते बर्बाद कर देते है। 

3. एपिस मेलिफेरा (इटालियन मधुमक्खी): 
यह मधुमक्खी को यूरोपियन मधुमक्खी नाम से भी जाना जाता है। वयस्क कार्यकर्ता मधुमक्खी की लंबाई १० मिमी से १५ मिमी है। वे प्रत्येक कॉलोनी में १० से १२ छते बनाती हैं।

इन मधुमक्खियों के प्राकृतिक आवास के खेतों की सीमाओं और वृक्षों के तने में पाया जाता है। वे आम तौर पर अपने छते को एक अंधेरी जगह में बनाते हैं जो उन्हें भारी धूप, वर्षा से बचाते हैं और उन्हें अन्य शिकारियों से बचाते हैं।

इस प्रकार की प्रकृति या व्यवहार के कारण, हम उन्हें पालतू कीट बनाने में सक्षम हैं।  व्यवहारमें यह मधुमक्खी के अन्य मधुमक्खी से कम हिंसक है, इसलिए वे मधुमक्खी के लकड़ी के बक्से या पेटी में आसानी से प्रबंधित कर सकते हैं।

एपिस मेलिफेरा मधुमक्खी को दुनिया में मधुमक्खी पालन उद्देश्य के लिए सबसे अधिक उपयोग किया जाता है।
एपीस मेलिफेरा - इटालियन मधुमक्खी
 इस मधु की एक औसत कॉलोनी हर साल ४० किलोग्राम से ६० किलो शहद पैदा करता है। परागण करने की क्षमता कोलोनी से लगभग २.५ किमी से ३ किमी तक की है।


४. एपिस सेराना इंडिका (भारतीय मधुमक्खी): यह मधु को स्थानीय रूप से "सात-पुड़ी मधुमक्खी " कहा जाता है। भारतीय मधुमक्खी की एक कॉलोनी में सात छते होते  हैं। वह इटालियन मधुमक्खी से थोड़ी ज्यादा आक्रामक है, लेकिन अगर आप इसे शांतिपूर्वक उन्हें संभालते हैं तो वे शांत रहती हैं।  इन मधुमक्खियों का प्राकृतिक आवास इटालियन मधुमक्खी के समान है। इन मधुमक्खियों द्वारा उत्पादित शहद आयुर्वेद के अनुसार पोषण से भरा होता है।

एपीस सेरना इंडिका- भारतीय मधुमक्खी

इस मधु की एक औसत कॉलोनी प्रति वर्ष ८ किलोग्राम १० किलोग्राम शहद पैदा करती है। परागण करने की क्षमता कोलोनिसे  से लगभग १ किमी से १.५ किमी तक है।

५. एपीस फ्लोरिया (छोटी मधुमक्खी): इस मधु को स्थानीय रूप से "पॉतिक मधुमखी" कहा जाता है। वे छोटे पौधे या एक पेड़ पर छोटेसा एक छता बनाती हैं। वे अन्य मधुमक्खी से कम आक्रामक होते हैं
चूंकि ये मधुमक्खियों द्वारा इकट्ठा हुआ शहद बहुत कम मात्र में होता हैं, प्रति वर्ष ५ किग्रा सेभी कम है। 

पौतिक मधुमक्खी
निम्न उत्पादकता के कारण, वे मधुमक्खी पालन उद्देश्य के लिए उपयोग नहीं किया जाता है।


६. ट्रायगोना एपी (सबसे छोटा मधुमक्खी): यह शहद दुनिया की सबसे छोटी मधुमक्खी है। ट्रायगोना एपी को एक डंख रहित मधुमक्खी के रूप में भी जानी जाती है। यद्यपि उनके पास डंख नहीं है लेकिन वे अपने रक्षन के लिए मुख से कटती हैं। उनके छोटे आकार के कारण वे अन्य मधुमक्खी की तुलना में कम परिचित हैं। इन मधुमक्खियों को संभालने के लिए कुछ विशेष प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है। मैंने कहीं पढ़ा है कि उनका उपयोग ग्रीनहाउस परागण के लिए किया जाता है।

शुद्र मधुमक्खी



10/1/18

8/12/17

मधुमक्खी पालन के लिए प्रशिक्षिण


अजवाइन के खेत में इटालियन मधुमक्खी के बक्स्से
  • यदि आप मुधुमक्खी पालन में प्रशिक्षिण की तलास कर रहे है, तो आप सही जगह पर है। हम आपको मधू/शहद और मधुमक्खीके बारे में सही जानकारी प्रदान करेंगे। आज का यह आर्टिकल मधुमक्खी पालन में प्रशिक्षिण के विषय में है।
  • मधुमक्खी पालन के लिए प्रशिक्षिण की आवश्यकता क्यों है?
  • क्योकि आप ऐसे जीव के साथ काम करना चाहते हो जिसके ऊपर मनुष्यों के बाद सबसे ज्यादा साहित्य मिलेगा। मधुमक्खी कोई सामान्य जीव नहीं हे परन्तु वह असामान्य से भी ऊपर है। यदि आप मधुमक्खी को शांति से देखेंगे तो आपको वह आपको प्रकृति द्वारा निर्मित सबसे सुंदर जीव लगेगी। उत्क्रांति के दोरान मधुमक्खीके शरीर रचनामें कुछ ऐसे बदलाव हुए है की वह एक जादू सा लगता है।
  • मधुमक्खी का पूरा जीवन फूलो पर निर्भर करता है। मधुमक्खी के भोजनका एक मात्र स्त्रोत फुल है। मधूमक्खी के सिर से लेकर पाव तक प्रत्येक अंग उसके जीवन के अस्तित्त्व के लिए एक सही उपकरण की तरह काम करते है। वास्तव में वनस्पति का और मनुष्योंका जीवन मधुमक्खी के परागण के कार्य पर निर्भर करता है। प्रतिभाशाली वैज्ञानिक आल्बर्ट आइंस्टाइन कहते थे के "अगर पृथ्वी से मधुमक्खी का नाश हो जाये तो सिर्फ चार साल मे ही सारी जीवसृस्टि खत्म हो जायेगी। "
  • यदि आप एक सफल मधुमक्खी पालक होना चाहते है, तो आपको मधुमक्खीका व्यवहार, मधुमक्खिकी शारीरिक रचना एवम मधुमक्खी को अनुकूलित फूलो का सामान्य ज्ञान होना आवश्यक है।
  • यहा पर में एक बात बताना चाहता हु के अगर आप मधुमक्खी पालन का काम एक व्यव्साय के रूप में करना चाहते हो तो कोई एक जगह पर स्थिर हो करना संभव नहीं है, क्युकी एक स्थान पर आपको पुरे साल फुल मिलते रहे यह संभव नहीं है। इसलिए यदि वास्तव में मधुमक्खी पालन से उचित वितीय उत्पादन चाहते है, तो आपको सीज़न के अनुसार मधुमक्खिके बक्सों\स्थानांतरित करना होगा।
  • गुजरात में मधुमक्खी पालन के क्षेत्र में पांच साल के अनुभव के अनुसार, मुझे पता चला की गुजरात में कई प्रकारकी मधुमक्खी के अनुकूलित फसलो की खेती की जाती है जैसी की धनिया, सौंफ, तिल, अजवाईन, अरहर, सरसों, मुंग, काले मुंग, कपास, बाजरा, सूर्यमुखी आदि की खेती की जाती है। नारयेल, बेरी, ड्रम स्टिक, निम्बू, आम और निलगिरी जैसे बागवानी पाक की खेती होती है। गुजरात के जंगल विस्तार में बबूल भी ज्यादा मात्रा में पाए जाते है।
  • फसलो और पौधों की यह विशाल जैवविविधता गुजरात में मधुमक्खी पालनमें सफलता को प्रभावित करती है। इसीलिए गुजरात में मधुमक्खी पालन का कार्य ज्यादा मुश्किल नहीं लगता हमने २०१२ में मधुमक्खी पालन का कार्य चालू किया था। आज हमारे पास ५०० से अधिक मधुमक्खी के बक्से है। हमारे प्रशिक्षित कर्मचारी मधुमक्खी पालन का कार्य राष्ट्रिय मधुमक्खी बोर्ड द्वारा निर्मित गाइडलाइन के अनुसार करते है
हमारे यहा प्रशिक्षण में निचे दिये गए विषय शामिल है।
  • बक्से के अन्दर मधुमक्खी का जीवन: हमारे प्रशिक्षित कर्मचारी आपको मधुमक्खिका जीवन चक्र, मधुमखियो का वर्ताव एवम उनके सोशियल वर्ताव को समजने आपकी मदद करेंगे।
  • मधुमक्खि का प्रबंधन: मधुमक्खी पालन में उपयोगी साधन सामग्री का विवरण इस विषय में सामिल है।
  • मधुमक्खीका आहार: यदि आप मधुमक्खी से ज्यादा शहद प्राप्त करना चाहते हो तो आपको मधुमक्खी के आहार के विषयमें जानकारी होना आवश्यक है।
  • एपिअरी का प्रबंधन: मधुमक्खी के बक्से जहा पर रखते है उस जगहको एपिअरी कहते है। एपिअरी के लिए पसंद की हुई जगहका मधुमक्की विकास एवम शहद ऊत्पादन पर प्रभाव पड़ता है।
  • मधुमक्खी के बक्सोंका स्थानांतरण: यह मधुमक्खिपालन का सबसे कठीन कार्य है। इस कार्य के लिए उचित प्रशिक्षणकी आवश्यकता है।
  • शहद और मधुमक्खी के अन्य उत्पादों की बिक्री: हमारे सेल्स विशेषज्ञ आपको मधू और मधुमक्खी उत्पदोकी बिक्रीमें मदद करेंगे।
  • मधुमक्खी की परागण कार्य से आर्थिक लाभ: मधुमक्खी के परागण के कार्य से आय में बढ़ोतरी हो सकती है।
  • मधुमक्खीपालन से जुडी समस्या का निवारण: मधुमक्खीको होने वाली बिमारिया एवम अन्य समस्या को हल करनेमें हमारे प्रशिक्षित कर्मचारी आपकी मदद करेंगे।
  • अधिक जानकारी के लिए संपर्क करे 
  • विमल वाढेर : 09275136336
  • डॉ. धर्मेश वाढेर : 09033959987
  • आर्टिकल को गुजराती भाषा में पढ़ने के लिए: http://indigenousrawhoney.blogspot.in/2017/12/blog-post.html
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